तीन तलाक कानून और संसद में मुस्लिम महिलाओं की “ज़ीरो” वॉयस

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निशार जेड सिद्दीकी

लोकसभा में तीन तलाक़ कानून को लेकर बॉक्सिंग डे पर जमकर हंगामा हुआ। सत्ता और विपक्षी सांसदों ने तीन तलाक़ क़ानून को लेकर गर्मागर्म बहस की। सत्तारूढ़ बीजेपी की तरफ से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और मीनाक्षी लेखी ने कानून के पक्ष में तर्क पेश किए तो कांग्रेस की तरफ से असम से सांसद सुष्मिता देव, रंजीता रंजन ने पक्ष रखा। लेकिन संसद में देश की जिन 7 फीसदी (अनुमानित) मुस्लिम महिलाओं के हक़ और इंसाफ की बात की जा रही थी, उनके नुमाइंदों को अपनी बात रखने का मौका किसी भी पार्टी ने नहीं दिया। अव्वल तो कांग्रेस, टीएमसी और आरएलडी से मुस्लिम महिला सासंद हैं, लेकिन उन्होने भी अपनी बात नहीं रखी या मुस्लिम महिला सांसदों को बात रखने का मौका ही नहीं दिया गया।

संसद में जिन मुस्लिम महिलाओं के मुस्तकबिल के लिए क़ानून बनना था, जिनकी बात हो रही थी, वहां उनकी बात रखने वाली कोई मुस्लिम महिला सांसद नहीं दिखी। कितना अजीब ये देखकर लगा कि AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी देश की तमाम मुस्लिम महिलाओं की तरफ से संसद में बोल रहे थे। यानी मुस्लिम महिलाओं की बात रखने का भी ठेका भी पुरुष समाज ने अपने पास ही रखा है। औरतों को घर की “वस्तु” समझने वाला भारतीय पितृसत्तात्मक समाज जब औरतों के हक़ और इंसाफ़ की बात होती है, तो वह उनको अपना दुख, अपनी पीडा़ को बताने का भी मौक़ा नहीं देता है। यह कितना हास्यास्पद है कि देश की 7% आबादी वाली मुस्लिम महिलाओं का संसद में सिर्फ़ 4 महिला सांसद ही प्रतिनिधित्व करती हैं। संसद में कुल 22 मुस्लिम सांसदों में सिर्फ 4 मुस्लिम महिला सांसद हैं, यह हाल ऐसा ही है जैसे देश के 543 सांसदों में सिर्फ 61 महिला सांसद हैं यानी देश की जनसख्या में 50% हिस्सेदारी रखनी वाली आबादी को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में सिर्फ 8% हिस्सेदारी मिलती है। वहीं अगर बात करें मुस्लिम महिलाओं की तो 7% जनसंख्या को 1 फीसदी से भी कम का प्रतिनिधित्व मिलता है। मुस्लिम महिला सांसदों के लिहाज से सबसे बुरा हाल हिन्दी पट्टी का है। जहां से सिर्फ एक महिला सांसद यूपी के कैराना से तबस्सुम हसन हैं, जिन्होंने उप-चुनाव में जीत हासिल की थी।

सोचिए कि भारतीय संसद में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों पर क्या चर्चा होती होगी। अगर तीन तलाक़ क़ानून को छोड़ दिया जाए तो शायद ही मुस्लिम महिलाओं के किसी भी गंभीर मुद्दों पर हमारी संसद में कोई बहस या चर्चा हुई होगी। सरसरी तौर पर देखें तो 1986 के बाद यानी 32 साल बाद मुस्लिम महिलाओं को केंद्र में रखकर कोई चर्चा हुई है। अफसोस इस बात का है कि उस वक्त भी मुद्दा तलाक़ था और आज भी मुद्दा तलाक़ ही है।

मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात करें तो अभी हाल ही में संपन्न हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सिर्फ एक मुस्लिम महिला विधायक जाहिदा बेग़म जीतकर विधानसभा पहुंची हैं। यानी अगर आंकड़े देखें तो मध्य प्रदेश (230), राजस्थान (200), छत्तीसगढ़ (90), तेलंगाना (119) और मिजोरम (40) विधानसभा को जोड़ दें तो कुल 779 सीटों में सिर्फ एक मुस्लिम महिला विधायक पहुंची हैं। सोचिए कि इन विधानसभाओं में मुस्लिम महिलाओं की क्या आवाज़ उठती होगी जहां उनका कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है। बीजेपी के देश में कुल अनुमानित 1515 विधायक हैं जिनमें सिर्फ 4 मुस्लिम विधायक हैं जिसमें कोई मुस्लिम महिला विधायक नहीं है। सोचिए इस पार्टी में मुस्लिम महिलाओं की बात कितनी गंभीरता से देखी जाती होगी। यही हाल कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथ सहित देश की तमाम प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों का है, जहां मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी या तो ज़ीरो है या फिर नाम मात्र ही उनको शामिल किया गया है।

अगर संसद में मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात करें तो आज़ादी के बाद से अब तक इन 75 सालों 15 से भी कम मुस्लिम महिलाएं ही संसद की दहलीज़ पर कदम रख पाई हैं। इनमें सिर्फ मोहसिना किदवई एकमात्र वो नेता हैं जिन्होंने तीन बार लगातार जीत हासिल की थी। देश के पहले लोकसभा चुनाव में 23 महिलाएं चुनकर संसद पहुंचीं, जिनमें एक भी मुस्लिम महिला नहीं थी. दूसरे लोकसभा चुनाव में माफिदा अहमद (जोरहट) और मैमूना सुल्तान (भोपाल) से जीत हासिल की। तीसरे लोकसभा चुनाव में जोहराबेन अकबरभाई चावदा (बांसकंथा-गुजरात) और मैमूना सुल्तान (भोपाल) से संसद पहुंची।

चौथे और पांचवें आम चुनावों में मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व शून्य रहा. छठवें चुनाव में अकबर जहां बेगम (श्रीनगर), राशिदा हक़ चौधरी (सिलचर-असम) और मोहसिना किदवई (आजमगढ़) संसद पहुंचीं. सातवें आम चुनावों में बेगम आबिदा अहमद (बरेली) और मोहसिना किदवई (मेरठ) ने जीत हासिल की. आठवें लोकसभा चुनाव में बेगम अख्तर जहां अब्दुल्ला (अनंतनाग), बेगम आबिदा अहमद (बरेली) और मोहसिना किदवई (मेरठ) ने जीत दर्ज की। नौवीं और दसवीं लोकसभा में एक भी मुस्लिम महिला संसद नहीं पहुंची। 11वें लोकसभा चुनाव में बेगम नूरबानो एकमात्र मुस्लिम महिला सांसद थीं। 12वें आम चुनाव में भी कोई मुस्लिम महिला सांसद नहीं थी। 13वें लोकसभा चुनाव में स़िर्फ बेगम नूर बानो (रामपुर) बतौर मुस्लिम महिला सांसद बनीं। 14वें लोकसभा में एकमात्र मुस्लिम महिला सांसद सैयदा रुबाब (बहराइच) से थीं। 2009 के लोकसभा चुनाव में तबस्सुम बेगम (कैराना), कैसर जहां (सीतापुर) और मौसम नूर (मालदा उत्तर) से जीतकर लोकसभा पहुंची हैं।

देश की संसद के बाद सबसे बुरा हाल राज्यों की विधानसभाओं में हैं। ज्यादातर राज्यों में मुस्लिम महिला विधायक हैं ही नहीं। जिन राज्यों में हैं वहां सिर्फ एक्का-दुक्का ही मुस्लिम महिला विधायक मिलेगी। सवाल उठता है कि मुस्लिम महिला विधायक या सांसद जब विधानसभा या फिर लोकसभा में नहीं होंगी तो उनकी बातों को मजबूती के साथ रखेगा कौन? जब तक वह विधानसभा या संसद में नहीं पहुंचेंगी उनकी आवाज़ क्या सच में उठती होगी? शायद इस “ज़ीरो” की वजह से ही मुस्लिम महिलाओं के लिए 32 साल भी तलाक़ को नए कलेवर में पेश किया गया। क्योंकि ना मुस्लिम महिलाएं तलाक़ से आगे बढ़ पाई हैं ना ही उन्हें इससे आगे बढ़ने दिया जा रहा है।

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