रोज़ा और मेडिकल साइंस

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रोज़ेकेफ़ायदे

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इस्लाम अमन और हिफ़ाज़त का मज़हब है। यह अपने मानने वालों को इबातदों में बेशुमार फैज़, बरकतें और हिकमतें अता करता है। इस्लामी इबादतों में ज़हनी, जिस्मानी और रूहानी फ़ायदों के बेशुमार राज़ छिपे हैं। आज माडर्न साइंस की रिसर्च उन छिपे हुए राज़ और हिकमतों को लोगों पर ज़ाहिर कर रही है और पुकार–पुकार कर कह रही हैं कि- ऐ मुसलमानों! तुम्हारे आक़ा मुहम्मदुर्रसूल्लाह ने सदियों पहले जो अहकाम तुम्हें दिये और ज़िन्दगी गुज़ारने के जो अन्दाज़ तुम्हें सिखाये वह अपने आप में बिल्कुल मुकम्मल (Perfect) हैं इसमें किसी भी तरह की कमी-पेशी मुमकिन नहीं है। जो कोई भी इस तरीक़े पर ज़िन्दगी गुज़ारेगा उसके लिये आख़िरत की नेअमतों के साथ दुनियावी नेअमतें भी बेशुमार हैं।

रोज़ाज़रूरी_है-

क़ुरआन पाक में इरशाद है कि-

“पस तुम में से जो शख़्स रमज़ान को पाये तो उसे चाहिये कि वह ज़रूर रोज़े रखे”

(सूरह अलबक़राह,आयत– 180)

रोज़ागुनाहोंकोजलादेता_है।

हज़रत अनस ؓ की एक रिवायत के मुताबिक़- “हुज़ूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि रमज़ान को रमज़ान इसलिये कहते हैं कि यह गुनाहों को जलाकर ख़त्म कर देता है।”
फ़ुक़हा ने रोज़े में छिपी पाँच हिकमतें बयान की हैं-

रोज़े से इन्सान तक़वा यानि परहेज़गारी हासिल करता है जो सब्र का मुक़ाम है।
शुक्र का मुक़ाम हासिल होता है क्योंकि रोज़ा रखना अपने रब की बेशुमार नेअमतों का शुक्र अदा करना भी है।
ईसार (यानि अपने फ़ायदे से ज़्यादा दूसरे के फ़ायदे का ख़्याल रखना) और क़ुरबानी का जज़्बा हासिल होता है।
तज़किया-ए-नफ़्स यानि नफ़्स की पाकी और सफ़ाई हासिल होती है।
एक मुसलमान के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी और अहम अल्लाह की रज़ा हासिल होती है।
रोज़े के बारे में कुछ माहिरीन (Scholors) के क़ौल-

जैसे-जैसे मैडिकल साइंस ने तरक़्क़ी हासिल की इससे यह हक़ीक़त साफ़ ज़ाहिर होती गई कि रोज़ा तिब्ब यानि मेडिकल साइंस में एक मोजिज़ा यानि चमत्कार है।

तुर्कस्कालरडाक्टरहलोकनूर_बाक़ी

रोज़े से ख़्यालात में बेचैनी नहीं रहती और जज़्बात की तेज़ी ख़त्म हो जाती है, बुराइयाँ और बदियाँ दूर हो जाती हैं।

डाक्टर__माइकल

ज़हनी सुकून और दिली इत्मिनान हासिल करने के लिये रोज़ा बेहतरीन चीज़ है।

डाक्टर_समरसेट

भूखा रहने का बेहतरीन तरीक़ा रोज़ा है। जिन्हें भूखा रहने की ज़रूरत हो वह इस्लामी तरीक़े से रोज़ा रखें, डाक्टर जिस तरह से भूखा रहने का तरीक़ा बताते हैं वह बिल्कुल ग़लत है।

डाक्टर_ऐमरसन

सेहत और तंदरुस्ती के लिये रोज़े के फ़ायदेः-

हमारे प्यारे नबीگ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है कि-

“रोज़े रखो तंदरूस्त हो जाओगे”

आजकल की मेडिकल रिसर्च से भी यह बात बिल्कुल वाज़ेह हो गई है कि-

रोज़ा हाज़मे के निज़ाम (Digestive System) को बेहतर बनाता है।
दिमाग़ को ताक़त देता है। एक रिसर्च के मुताबिक़ रोज़े से Neurotrophic Factor का level बढ़ता है जिससे ज़्यादा Brain cells पैदा होते हैं और दिमाग़ की सलाहियत बेहतर होती है।
तनाव को कम करता है। रोज़े से Hormone Cortisol में कमी आने की वजह से तनाव कम होता है।
बुरी आदतों जैसे तम्बाकू नोशी (Smoking) वग़ैरा से छुटकारा हासिल करने के लिये सबसे बेहतर वक़्त रमज़ान का महीना है।
जिस्म को बीमारियों से लड़ने की ताक़त बढ़ाने के लिये Immune System को बेहतर बनाता है।
दौराने ख़ून (Blood Circulaion) को बेहतर करता है।
कौलेस्ट्रोल जो दिल की बीमारी और फ़ालिज की ख़ास वजह है उसे ख़त्म कर देता है।
Blood Sugar में कमी आती है। रोज़े में ज़रूरी Energy हासिल करने के लिये जिस्म में जमा ग्लूकोज़ टूटने लगता है जिससे Insulin बनने में कमी आ जाती है और Blood Sugar कम होता है।
मोटापा कम होता है। ग्लूकोज़ Break down की वजह से जब सारा ग्लूकोज़ ख़त्म हो जाता है तो Ketosis का अमल यानि Fats का break Down शुरू हो जाता है और गुर्दे और माँसपेशियों पर इकठ्ठी हुई चर्बी टूटने लगती है जिससे Energy हासिल होती है।
रोज़े से दिल, दिमाग़, जिगर, मेदा, आँतें, और गुर्दों वग़ैरा को आराम मिल जाता है जिससे इनके काम करने की सलाहियत बेहतर होती है।
आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के मशहूर प्रोफ़ेसर मोर पाल्ड के मुताबिक़ वह मेदे के वरम में मुब्तिला थे और किसी इलाज से फ़ायदा नहीं हो रहा था लिहाज़ा उन्होंने रोज़े के फ़ायदों के बारे में सुनकर आज़माने के लिये इस्लामी तरीक़े पर रोज़े रखना शुरू कर दिये और कुछ ही दिनों में उनके वरम में कमी आने लगी और जिस्म पर और भी कुछ फ़ायदेमन्द असरात ज़ाहिर होने लगे। लिहाज़ा उन्होंने रोज़ों को जारी रखा और एक महीने में उनकी तकलीफ़ बिल्कुल दूर हो गई और जिस्म बिल्कुल Normal हो गया।

ज़रा सोचिए! हमारे लिये इससे बढ़कर बदक़िस्मती की बात क्या होगी कि हम सेहत व तन्दरुस्ती हासिल करने के लिये और बीमारियों के इलाज के लिये इधर-उधर भटक रहे हैं, दूसरों के दरो पर धक्के खा रहे हैं लेकिन अपने उस रब के अहकाम पर अमल करके दुनिया व आख़िरत की भलाई हासिल नहीं कर रहे जो हमारा ख़ालिक (बनाने वाला) भी है और मालिक भी। अपने उस प्यारे नबी की प्यारी-प्यारी सुन्नतों पर अमल नहीं कर रहे जिसको अल्लाह ने रहमत बनाकर भेजा है जिसकी हर बात रहमत है, हर काम रहमत है, हर सुन्नत रहमत। दूसरे मज़हबों के लोग आप की तालीम से फ़ायदा उठा रहे हैं लेकिन हम महरूम हैं, यह बदक़िस्मती नहीं तो और क्या है?

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