सेनारी नरसंहार:हाईकोर्ट ने जहानाबाद के चर्चित सेनारी नरसंहार केस में सभी 13 दोषियों को बरी कर दिया

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हाईकोर्ट ने जहानाबाद के चर्चित सेनारी नरसंहार में शुक्रवार को निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सभी 13 दोषियों को बरी कर दिया है। जस्टिस अश्वनी कुमार सिंह और जस्टिस अरविंद श्रीवास्तव की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे शुक्रवार को सुनाया। जहानाबाद जिला अदालत ने 15 नवंबर 2016 को इस मामले में 10 को मौत की सजा सुनाई थी, जबकि 3 को उम्रकैद की सजा दी थी।

हाईकोर्ट में आरोपी पक्ष का तर्क था कि गवाह इस स्थिति में नहीं थे कि रात में अभियुक्तों की पहचान कर सकते, जबकि किसी क़िस्म की रोशनी नहीं थी। गवाह यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि वो अभियुक्तों को देख पाने में सक्षम थे। गवाह घटनास्थल पर एक दूसरे की उपस्थिति की पुष्टि नहीं करते हैं। केस में दुक्खन राम, बच्चेश सिंह, बुधन यादव, गोपाल साव, बूटाई यादव, सत्येंद्र दास, लल्लन पासी, गोराई पासवान, उमा पासवान, करीमन पासवान और द्वारिका पासवान को निचली कोर्ट ने फांसी की सजा दी थी। जबकि अरविंद यादव, मुंगेश्वर यादव और विनय पासवान को उम्रकैद की सजा मिली।

अब हाईकोर्ट ने सभी को बरी करते हुए फौरन जेल से रिहा करने का आदेश दिया है, बशर्ते उन्हें किसी दूसरे केस में जेल में बंद न किया गया हो। इस कांड के अनुसंधानकर्ता जमुना सिंह का निधन ट्रायल के दौरान ही हो गया था। इसलिए पूरा मामला आईओ की गवाही के बगैर चला था।

तस्वीर झूठ नहीं बोलती ,लेकिन अंधेरे में खो गया न्याय

हाईकोर्ट के शुक्रवार के फैसले का आधार-गांव में रोशनी की कमी है। गवाहों ने आरोपियों को अदालत के सामने आइडेंटिफाई किया लेकिन हाईकोर्ट के अनुसार वो अपने आप में संदिग्ध-ठोस सबूत नहीं है। घटना अमावस की अंधेरी रात को हुई थी। इसे गवाहों ने अपनी गवाही में बताया। गांव में कोई बिजली या रोशनी भी नहीं थी।

कुछ चश्मदीद ने टॉर्च की रोशनी में आरोपियों को पहचानने का दावा किया। यह दावा कमजोर-संदेहास्पद माना गया, क्योंकि आरोपी गवाहों के गांव के नहीं थे। उक्त गवाहों ने आरोपियों को पहले कभी नहीं देखा था। साथ ही कोर्ट में आइडेंटिफाई करने से पहले, कभी भी आरोपियों का कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराया गया था।

बाथे का बदला मानते हैं सेनारी दोनों के दोषी अब बरी हो गए

90 के दशक में बिहार जातीय संघर्ष से जूझ रहा था। सवर्ण और दलित जातियों में खूनी जंग चल रहा था। जमीन-जायदाद को लेकर एक-दूसरे के खून के प्यासे थे। एक को रणवीर सेना नाम के संगठन का साथ मिला तो दूसरे को माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर का। 18 मार्च 1999 की रात को सेनारी गांव में 500-600 लोग घुसे। पूरे गांव को चारों ओर से घेर लिया।

घरों से खींच-खींच कर मर्दों को बाहर निकाला गया। 40 लोगों को खींचकर गांव से बाहर ले जाया गया। गांव के बाहर सभी को एक जगह इकट्ठा किया गया। फिर तीन ग्रुप में सबको बांट दिया गया। फिर लाइन में खड़ा कर बारी-बारी से हर एक का गला काटा गया। पेट चीर दिया गया। 34 लोगों की नृशंस हत्या कर दी गई।

घटना के अगले दिन तब पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार रहे पद्मनारायण सिंह अपने गांव सेनारी पहुंचे। अपने परिवार के 8 लोगों की फाड़ी हुईं लाशें देखकर उनको दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। उनके बेटे रामाकांत सिंह पटना हाईकोर्ट के नामी गिरामी अधिवक्ता हैं।

सेनारी में हुए 34 लोगों के नरसंहार को अरवल के नारायणपुर बाथे और शंकर बिगहा में हुए नरसंहार का बदला माना गया था। उस समय एमसीसी और रणवीर सेना के बीच टकराव आम बात थी। 30 दिसंबर 1997 की आधी रात को नारायणपुर बाथे में 58 लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतारा गया था, जिसमें सभी दलित थे। आश्चर्य है कि बाथे नरसंहार में भी कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।

ऐसे ही कारणों से हर नरसंहार के दोषी बरी

एक के बाद एक नरसंहार के मामलों में दोषी बरी होते जा रहे हैं। इन सभी में कारण-सबूत का अभाव। एक्सपर्ट की मानें तो मामले इतने लंबे चलते हैं कि सबूत धीरे-धीरे खुद ही खत्म होते चले जाते हैं। जैसे सेनारी केस में भी हुआ।

लक्ष्मणपुर बाथे : यह बिहार के नरसंहारों में सबसे बड़ा और नृशंस। बच्चों-गर्भवती महिलाओं को भी निशाना बनाया गया। 30 नवंबर, 1997 की रात रणवीर सेना ने 58 लोगों की हत्या की थी। पटना की विशेष अदालत ने 7 अप्रैल, 2010 को 16 दोषियों को फांसी और 10 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। लेकिन पटना हाइकोर्ट के नौ अक्तूबर, 2013 के फैसले में सभी दोषियों को बरी कर दिया था।

शंकर बिगहा नरसंहार : 25 जनवरी 1999 की रात जहानाबाद में हुए शंकर बिगहा नरसंहार में 22 दलितों की हत्या कर दी गई थी। घटना के 16 वर्षों बाद साल 2015 में 13 जनवरी को इस मामले में फैसला सुनाया गया। जहानाबाद जिला अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 24 अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया था। यह शायद पहला मामला था जिसमें सभी

बथानी टोला : साल 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई। साल 2012 में उच्च न्यायालय ने इस मामले के 23 अभियुक्तों को भी बरी कर दिया था। इस मामले में निचली अदालत ने तीन अभियुक्तों को फांसी और 20 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा दी थी।

मियांपुर नरसंहार : औरंगाबाद के मियांपुर में 16 जून 2000 को 35 दलित लोगों की हत्या कर दी गई थी। जुलाई 2013 में पटना हाइकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में 10 अभियुक्तों में से नौ को बरी कर दिया था।

लोअर कोर्ट ने इनमें से 10 को फांसी और 3 को उम्रकैद की सजा दी थी

लोअर कोर्ट ने इनमें से 10 को फांसी और 3 को उम्रकैद की सजा दी थी

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