15 वर्षों में भी सभी 38 जिलों में विद्युत शवदाह गृह स्थापित नहीं करा पाई सरकार,2018 में भी हाईकोर्ट ने कहा था

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बिहार सरकार का जोर पर्यावरण पर खूब रहा लेकिन अभी तक सभी 38 जिलों में विद्युत शवदाह गृह नहीं बनवा सकी। न इसका प्रचार-प्रसार कर सकी कि विद्युत शवदाह गृह में दाह संस्कार से पर्यावरण और लोगों को कितना फायदा है। अभी पटना में बांस घाट, गुल्बी घाट में दो-दो और खाजेकलां में एक विद्युत शवदाह केन्द्र काम कर रहा है। पटना के अलावा भागलपुर, मुंगेर, मोकामा, सोनपुर, कोन्हरा में एक-एक केन्द्र हैं। यानी बिहार में कुल 10 विद्युत शवदाह गृह हैं।

इसको लेकर सरकारी कसरत पर नजर डालें तो सिमरिया घाट पर विद्युत शवदाह गृह तैयार होने की प्रक्रिया में है। गया में इको फ्रेंडली विद्युत शवदाह गृह बन रहा है। मोकामा और गोपालगंज में भी निर्माण चल रहा है। सभी जिलों में विद्युत शवदाह स्थापित करने में देरी से लकड़ियों की खपत बड़े पैमाने पर तो हो ही रही है, पर्यावरण को भी हर दिन काफी नुकसान हो रहा है।

पटना जैसे बड़े शहरों में भी इसकी संख्या बढ़नी चाहिए थी, लेकिन वह भी नहीं हुआ। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच विद्युत शवदाह गृह पर काफी दबाव देखा जा रहा है। पटना के बांस घाट की स्थिति यह रही कि कोरोना के पीक में यहां कई बार 24 घंटे तक लाश रखकर परिजनों को इंतजार करना पड़ा।

2018 में हाईकोर्ट ने सभी 38 जिलों में विद्युत शवदाह गृह की स्थापना के लिए कहा

राजीव गांधी गंगा एक्शन प्लान 1986 में आया। इसी के तहत बिहार में 1986 से लेकर 1990 के बीच विद्युत शवदाह गृह स्थापित किए गए। पटना में बांसघाट, गुल्बी घाट और खाजेकलां घाट पर इसे स्थापित किया गया। 2003 में पटना के तीनों विद्युत शवदाह गृह बंद पड़े थे। उस समय विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा ने पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। हाईकोर्ट के आदेश पर सरकार ने इसे फिर से शुरू करवाया। तब जस्टिस आर के गर्ग ने बिहार सरकार पर टिप्पणी की थी कि ‘जिंदों के लिए कुछ नहीं करते, मरने के बाद सही तरीके से जलने तो दो’।

पटना के तत्कालीन मेयर कृष्ण मुरारी प्रसाद यादव पर हाईकोर्ट ने कमेंट किया था कि ‘पटना नगर निगम के क्षेत्र में जो भी मौत होगी, उसके लिए लकड़ियों पर होने वाले खर्च मेयर से लिए जाएं।’ उस समय आनन-फानन में सरकार ने पटना के तीनों विद्युत शवदाह गृह 48 घंटे में चालू करवाया था।

2018 में पटना हाईकोर्ट के जस्टिस शिवाजी पांडेय ने निर्देश दिया कि ‘बिहार के 38 जिलों में विद्युत शवदाह गृह की स्थापना की जाए, ताकि कम पैसे में लोगों का दाह संस्कार किया जाए और पर्यावरण की सुरक्षा भी हो।’ सरकार ने पटना हाईकोर्ट के निर्देश पर ही 2017 में पशुओं को जलाने के लिए पटना के रामचक बैरिया में बिहार का पहला पशु विद्युत शहदाह गृह तीन करोड़ 57 लाख रुपए से स्थापित करवाया था।

2022 तक 24 हजार 524 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे

बिहार सरकार ने जब ‘जल जीवन हरियाली’ की बात की तो इसकी सफलता के लिए ग्रामीण विकास, पर्यावरण वन व जलवायु परिवर्तन, जल संसाधन, राजस्व व भूमि सुधार, लघु जल संसाधन, नगर विकास, पीएचईडी, कृषि, भवन, जल संसाधन, पशुपालन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पंचायती राज, ऊर्जा, सूचना व जनसंपर्क सहित 15 विभाग शामिल किए। 2022 तक जल जीवन हरियाली योजना पर 24 हजार 524 करोड़ रुपए खर्च होना है। नगर आवास विभाग के तहत विद्युत शवदाह गृह हर जिले में स्थापित होना है।

लकड़ी से दाह संस्कार हर तरह से काफी महंगा

विद्युत शवदाह गृह के माध्मय से अंतिम संस्कार करने का चार्ज 350 रुपए लिया जाता है, जबकि लकड़ी से जलाने पर 7 मन लकड़ी खर्च होती है। डेड बॉडी ज्यादा भारी हुआ तो 9 मन लकड़ी खर्च होती है। नौ मन लकड़ी का खर्च 4500 रुपए आता है। जिन पेड़ों से लकड़ी ली जाती है वैसा एक पेड़ तैयार होने में 20 से 25 साल लगते हैं। ऐसा एक पेड़ हर दिन 230 लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे 7 लोगों को ऑक्सीजन मिलता है।

ऐसा नहीं है कि यह सब बिहार सरकार के मंत्री या अफसर नहीं जानते। बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार ने विधान परिषद् में बताया है कि ‘एक पेड़ साल में 20 किलो धूल सोखता है। 700 किलो ऑक्सीजन छोड़ता है और 20 हजार किलो कार्बनडाइऑक्साइड सोखता है। घर के पास 10 पेड़ लगे हों तो आदमी की उम्र 7 साल तक बढ़ जाएगी।’

हर जिले में विद्युत शवदाह गृह होते तो गंगा में लाशें तैरती नहीं दिखतीं

इस सबके बावजूद पता नहीं सभी जिलों में विद्युत शवदाह गृह स्थापित करने में और कितना समय लगेगा? इस मामले पर कई बार हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा कहते हैं कि समय पर विद्युत शवदाह की स्थापना कर दी गई होती तो गंगा में इस तरह शव नहीं पाए जाते। जहां-तहां लाशें नहीं फेंकी जाती। लाशों का सम्मान भी होता।

टेंडर निकालने में देर पर देर

जानकारी है कि जहां इसकी सुविधा नहीं है, उन जिलों में विद्युत शवदाह गृह स्थापित करने के लिए सरकार टेंडर की प्रक्रिया अपनाने वाली है। कोरोना की वजह से इसमें देर हो रही है। समय रहते जो अनदेखी अस्पतालों की हुई, वही इस मामले में भी दिखी है।

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