असली लोक जनशक्ति पार्टी चिराग पासवान की…क्योंकि

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LJP (लोक जनशक्ति पार्टी) में टूट के बाद चाचा पशुपति पारस और भतीजा चिराग पासवान के बीच तलवार खिंच गई हैं। इन सबके बीच एक सवाल यह उठता है कि कभी बिहार में सत्ता की चाबी लेकर घूमने वाली LJP पर किसका हक होगा। हालांकि LJP के पारस गुट ने कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरजभान सिंह को बनाया है। वहीं, पहले से LJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने ये ऐलान किया है कि LJP उनकी मां है और वह अपने संगठन को मजबूत करते रहेंगे।

लोकसभा अध्यक्ष के मान्यता देने पर सवाल
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति के जानकार अरुण पांडे कहते हैं कि मैं हैरान हूं, लोकसभा अध्यक्ष ने पशुपति पारस को LJP का संसदीय दल का अध्यक्ष कैसे बना दिया। जबकि, संविधान के 91वें संशोधन में इसका जिक्र है कि दल के दो तिहाई सदस्य यदि बाहर जाते हैं और एक भी सदस्य पार्टी के अंदर रहता है तो पार्टी उसकी रह जाती है। जो बाहर के होते हैं, उनकी सदस्यता बच जाती है, लेकिन उनका पार्टी पर हक नहीं रहता है। उनको एक गुट बनाकर किसी दूसरे दल में विलय करना होता है या शामिल होना होता है।

हैरानी इस बात से हो रही है कि चुनाव आयोग के पास राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर यदि चिराग पासवान हैं तो पार्टी उनके हाथ में है। लोकसभा अध्यक्ष अलग से LJP के संसदीय दल का नेता दूसरे को नहीं मान सकते हैं। यह दल बदल कानून के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट में हार जाएगा पारस गुट
अरुण पांडे याद दिलाते हैं कि 1997 में जब लालू यादव को जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष से हटना पड़ा था तो उन्होंने अपने समर्थक विधायकों और सांसदों के साथ एक अलग गुट बनाया था। बाद में उसका नाम राष्ट्रीय जनता दल दिया था। अरुण पांडेय यह भी बताते हैं कि चिराग पासवान यदि इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चले जाते हैं तो पहली ही सुनवाई में LJP पर पूरा हक चिराग पासवान का होगा। जिन्होंने पार्टी छोड़ी है, उनको दूसरा गुट बनाना होगा।

इससे पहले भी RLSP की टूट हुई थी, उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, दूसरे नेता RLSP पर अपना हक जताते रहे, लेकिन अंततः RLSP पर संवैधानिक हक उपेंद्र कुशवाहा का ही रहा था। यह समझ से परे है कि लोकसभा अध्यक्ष ने चिराग पासवान के संसदीय दल के अध्यक्ष के तौर पर रहते दूसरे गुट को LJP के संसदीय दल के अध्यक्ष के तौर पर मान्यता कैसे दे दी?

क्या है दल-बदल कानून में प्रावधान
1985 में बने इस कानून में मूल प्रावधान यह था कि अगर किसी पार्टी के एक तिहाई विधायक या सांसद बगावत कर अलग होते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। इसके बाद भी बड़े पैमाने पर दल-बदल की घटनाएं जारी रहीं। फिर, 2003 में संविधान में 91वां संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत दल- बदल कानून में बदलाव कर इस आंकड़े को दो तिहाई कर दिया गया। इधर, LJP की टूट की वजह तो सामने आ गई, लेकिन इस टूट में अहम भूमिका निभाने वाले JDU के नेता अपने आप को इस प्रकरण से अलग करने में लगे हैं।

JDU के मुख्य प्रवक्ता और MLC संजय सिंह बताते हैं उनका या फिर उनकी पार्टी का कहीं भी हस्तक्षेप नहीं था। ये रामविलास पासवान के परिवार के अंदर की खटपट है, जो सामने आ गई। संजय सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी तोड़फोड़ में विश्वास नहीं रखती है। लेकिन, नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को देखते हुए दूसरे दल के नेता भी उनमें आस्था रखते हैं। ऐसे में यदि कोई भी JDU में आता है तो उसका स्वागत है।

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