जिस चंदा बाबू के बेटों को एसिड से नहलाया,उसी ने लंबी लड़ाई लड़ कर शहाबुद्दीन को जेल पहुंचाया

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जिस शहाबुद्दीन नाम का खौफ सीवान ही नहीं, पूरे बिहार में था, उसे एक आम आदमी ने सलाखों के पीछे पहुंचाया था। अपने तीन जवानों बेटों की हत्या की लंबी लड़ाई लड़ी। वे शहाबुद्दीन को फांसी दिलवाना चाहते थे, लेकिन नियति ने उनकी मौत कोरोना संक्रमण से लिखी थी।

बात 16 अगस्त 2004 की शाम की है। सीवान के गौशाला रोड स्थित राजीव किराना स्टोर में सात-आठ युवकों ने धावा बोल कैश लूट लिया। सभी धमकी देते हुए निकले कि किसी ने चू-चपड़ की तो अंजाम भुगतना होगा। दुकान में बैठे राजीव ने विरोध किया तो उसकी पिटाई कर दी गई। खतरा देख गिरीश बाथरूम में घुस गया और वहां से एसिड की बोतल लाकर बदमाशों को डराया कि भागो नहीं तो एसिड फेंक देंगे। यह देख सभी भाग गए, लेकिन कुछ ही समय बाद वे सभी झुंड बनाकर पहुंचे। दबंगई ऐसी कि राजीव के साथ गिरीश और सतीश को उठा लिया। तीनों को प्रतापपुर लेते गए। वहां ईख के खेत के पास गिरीश और सतीश को पेड़ से बांध दिया गया। राजीव को बैठा कर रखा गया। कुछ देर बाद तत्कालीन सांसद शहाबुद्दीन वहां पहुंचे। शहाबुद्दीन ने अपना कोर्ट लगाया और उस कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दोनों को एसिड से स्नान कराओ। शहाबुद्दीन का फरमान सुनते ही उनके गुर्गों ने गिरीश और सतीश पर तेजाब डालना शुरू किया। दोनों चीखते रहे। एसिड से धुंआ उठता रहा। गंध फैलती रही। दोनों की छटपटाहट पर किसी को रहम नहीं आई। राजीव को तो काटो तो खून नहीं। वह साइलेंट हो गया।

थाना प्रभारी कांप उठा, एसपी नहीं मिले, डीपीओझा ने लाज रखी
अब राजीव को बंधक रख फिरौती की मांग शुरू हुई। तीन दिन तक चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू की नींद उड़ी रही। तीसरे दिन राजीव किसी तरह भागकर घर पहुंचा और पिता चंदा बाबू को शहाबुद्दीन की कारास्तानी बताई। सुनकर चंदा बाबू को होश फाख्ता हो गए। शहाबुद्दीन के गुर्गों ने उनको धमकी भी दी लेकिन उन्होंने मन को मजबूत किया और बिना किसी परवाह के थाना पहुंच गय। शहाबुद्दीन के खिलाफ केस लेने में थानेदार कांप उठा। उसने समझाया कि शहाबुद्दीन से पंगा लेना कितना महंगा पड़ सकता है इसको समझबूझ लीजिए। चंदा बाबू को एसपी के पास जाना पड़ा। जब एसपी ने भी मुलाकात नहीं की तो वे डीआईजी के पास गए। डीआईजी के हस्तक्षेप के बाद थाने में मामला दर्ज हुआ। डीआईजी का नाम था डीपी ओझा।

19 को चश्मदीद राजीव को गवाही देनी थी, 16 को भून दिया
मामला कोर्ट में पहुंचा चंदा बाबू ने शहाबुद्दीन का नाम साजिशकर्ता के रूप में दिया। 70 की उम्र में चंदा बाबू गवाह बने। चंदा बाबू को डर था कि पहले के कई मामलों की तरह इस बार भी शहाबुद्दीन साफ बच न जाए। घर में पत्नी थी और चौथा दिव्यांग बेटा। उसकी देखभाल की भी जवाबदेही थी। चंदा बाबू के तीसरे बेटे राजीव जो दोहरे हत्याकांड के चश्मदीद थे की गवाही कोर्ट में 19 जून 2014 को होनी थी उससे पहले 16 जून को गोलियों से भून दिया गया।

चंदा बाबू ने तय कर लिया कि वे घुट-घुट कर नहीं जियेंगे
दिसंबर 2020 को न्यायालय में इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते चंदा बाबू का निधन हो गया। वे चाहते थे कि उनके बेटों के हत्यारे शहाबुद्दीन को फांसी हो। चंदा बाबू को इस बात का डर था कि शहाबुद्दीन से पंगा लेना महंगा पड़ेगा लेकिन उन्होंने जान की फिक्र नहीं की। एक पिता ने तय किया कि वह बेटों की नृशंस हत्या के बाद घुट-घुट कर नहीं जियेंगे। चंदा बाबू का साथ न्यायालय ने दिया था।

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