विवाह पंचमी मेला पर लग रहा ग्रहण,अब बैलों की नहीं सुनाई पड़ती घंटी

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पांच दशक पूर्व तक जिले में चैत रामनवमी और अगहन विवाह पंचमी के अवसर पर लगने वाला मेला का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। विश्व प्रसिद्ध मेला के संदर्भ में जानकारी रखने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक राम नरेश ठाकुर ने बताया कि एशिया स्तर पर सोनपुर के बाद सीतामढ़ी के पशु मेला का महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। हजारों की संख्या में सीतामढ़ी के अलावा पड़ाेसी देश नेपाल से लाखों की संख्या में किसान अपना बैल ला कर खरीद-बिक्री करते थे। संपूर्ण मेला परिक्षेत्र में तकरीबन दो से ढाई महीने तक देश के विभिन्न प्रान्तों से पशु व्यापारी वृहद स्तर पर व्यापार करते थे।

मेले में नए नए नस्ल के बैलों के अलावा हाथी, घोड़ा, ऊंट समेत विभिन्न प्रकार के मनोहारी पक्षियों की भी खरीद-बिक्री की जाती थी। वहीं दूसरी ओर महिला परिक्षेत्र में सरकारी निर्देश के आलोक में प्रशासनिक स्तर पर कैंप लगा कर किसानों को सरकार प्रायोजित योजनाओं की जानकारी भी दी जाती थी। जिले के ऐतिहासिक गौशाला प्रांगण में गोपाष्टमी के अवसर पर देश के नामचीन कवियों को आमंत्रित किया जाता था। रातभर लोग हास्य व्यंग्य कवि सम्मेलन का आनंद उठाते थे। मिथिलांचल के कोने-कोने से विभिन्न प्रकार की कलाओं की प्रदर्शनी के लिए कारोबारियों का जमावड़ा भी लगता था।

सनातन धर्म केंद्रीय पुस्तकालय भी व्यावसायिक केंद्र में बदला : जिले में साहित्यिक गतिविधियों के बढ़ावे को लेकर स्थापित सनातन धर्म केंद्रीय पुस्तकालय भी व्यावसायिक केंद्र के रूप में तब्दील होने लगा। सरकार प्रायोजित विभिन्न योजनाओं के प्रचार-प्रसार के बाद भी कला का विकास जिले में शून्य तक सिमटा है। जानकी जन्मस्थली होने के कारण विकास के नाम पर करोड़ों राशि आवंटित की गई। कुल मिला कर ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों से परिपूर्ण जिले का विकास जमीन की बजाय सोशल मीडिया पर व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। इसे जमीन पर लाने की आवश्यकता है।

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